व्यक्तित्व के सर्वागीण विकास में योग की भूमिका
डाॅ. श्याम सुन्दर पाल
योग विभाग, इंदिरा गाॅधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय, अमरकंटक (म.प्र)
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व्यक्तित्व एक विकासात्मक तंत्र है। जन्म से लेकर मृत्यु तक यह प्रक्रिया चलती रहती है। प्रत्येक व्यक्ति में जन्मजात कुछ जैविक योग्यताएँ वर्तमान रहती है, मनुष्य इन्हीं योग्यताओं के साथ सामाजिक प्रभावों के बीच पलता बढ़ता है। इस प्रकार जन्मजात जैविक योग्यताओं और सामाजिक प्रभावों का अन्तःक्रियाओं के फलस्वरूप ही किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व अपूर्व ढंग का होता है।
प्रत्येक व्यक्ति की समानता और अपूर्वता किस प्रकार निर्धारित होती है इस पर मनोवैज्ञानिकों के बीच दो तरह की विचारधाराएँ है। एक विचारधारा व्यक्तित्व का विकास आनुवंषिकता के कारण मानती है और दूसरी विचारधारा इसका आधार वातावरण को मानती है।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू मैत्री, करूणा, मुदिता, क्रियायोग
प्रस्तावना
योग दर्शन भारतीय दर्शन शास्त्र की एक अत्यंत प्राचीन शाखा है। योग को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय महर्षि पतंजलि को है। परंतु इससे पूर्व भी विश्रृंखलित रूप में वेदों, उपनिषदों, सूत्रों आदि में योगदर्शन की विशेषताएँ मिलती है। ऋग्वेद में कई स्थलों पर यौगिक प्रक्रिया का उल्लेख है (ऋग्वेद 1.164.31 तथा 10.177.3)। उपनिषदों में तो ’योग प्रक्रिया के बहुत से प्रमाण उपलब्ध है। श्वेताश्वतरोपनिषद् (2-7-15)में क्रियात्मक योग का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है-समाधि करते समय सिर, गर्दन और रीढ़ को एक सीध में रखना, इन्द्रियों को मन के द्वारा वश में करना, श्वास-प्रश्वास का नियमन, समतल, पवित्र मनोनुकूल स्थान पर योग का अभ्यास करना आदि विधान यहाँ बताए गए है।छान्दोग्योपनिषद (8,6), वृहदारण्यकोपनिषद् (4.3.20) और कौशीतकिउपनिषद् (4.19) में हृदय से पुरीतत (अंतड़ियों) तक जाने वाली नाड़ियों का वर्णन है। उपनिषदांें के बाद पुराणों में ’योग’ का विस्तार से वर्णन मिलता है। प्राचीन ऋषियों की अंतदृष्टि का कारण भी योग ही था, तभी से दार्शनिकों और धर्म प्रचारकों ने ’योग’ की उपयोगिता स्वीकार कर ली है तथा उसका विवेचन अपने-अपने दृष्टिकोण से किया है इसलिए ’योग के अनेक प्रकार है। बुद्ध धर्म में पालीत्रिपिटकों तथा संस्कृत-ग्रन्थों में भी योग का विवेचन पर्याप्त मात्रा में मिलता है। महावीर स्वामी स्वयं योगी थे और जैन धर्म में योग का विवेचन विशिष्टता से हुआ है। तंत्रों में तो योग का महत्वपूर्ण स्थान है ही। गोरखनाथ के ’नाथ-सम्प्रदाय’ में योग का इतना आदर है कि उस संप्रदाय को ’योगी संप्रदाय’ के नाम से पुकारते है। नाथपंथी सिद्ध ’हठयोग’ के परमाचार्य माने गए है। ’मंत्र योग’, ’लय योग, आदि प्रसिद्ध है ही परन्तु योगदर्शन पतंजलि का दर्शन है जिसे ’राज योग’ की संज्ञा मिली है।
पतंजलि योग सूत्र
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि योगदर्शन अत्यंत प्राचीन है। पतंजलि ने इसी सामग्री को एकत्रित करके उसे अपने मौलिक विचारों से सजाकर एक व्यवस्थित रूप दे दिया है। याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार हिरण्यगर्भ योग के वक्ता है। पतंजलि ने योग का मात्र अनुसंधान किया, अर्थात प्रतिपादित शास्त्र का उपदेश मात्र दिया है। अतः वे योग के प्रवर्तक न होकर प्रचारक या संशोधक मात्र है। परंपरा के अनुसार’योग सूत्र’ के रचयिता और व्याकरण महाभाष्य के निर्माता पतंजलि एक ही व्यक्ति है। ’योग सूत्र’ की रचना विक्रम पूर्व द्वितीय शताब्दि में हुई मानी जाती है।
’योग सूत्र’ में चार पाद है, जिनकी सूत्र संख्या 195 है। पहला पाद ’समाधिपाद’ है। जिसमें समाधि के रूप तथा भेद एवं चित्त और चित्त वृत्तियों का वर्णन है। दूसरा पाद है ’साधनपाद’, जिसमें क्रियायोग क्लेश तथा उसके भेद, क्लेशों को दूर करने के दो प्रकार के साधनों का वर्णन है। आंतरिक साधनों में धारणा, ध्यान, समाधि की चर्चा है तथा बाह्म साधनों मे यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार आदि का वर्णन है। तीसरे पाद ’विभूतिपाद’ में आंतरिक साधनों के साथ-साथ योगाभ्यास की सिद्धियों का भी वर्णन है। यहाँ बताया गया है कि धारणा, ध्यान और समाधि तीनों का सम्मिलित रूप ’संयम’ है। यह संयम ’योग’ के लिए नितांत आवश्यक है और चैथे पाद ’कैवल्य पाद’ में मुख्य रूप से कैवल्य या मुक्ति अथवा मोक्ष के स्वरूप का पूर्ण रूप से विवेचन किया गया है। यहाँ प्रकृति-पुरूष पर भी प्रकाश डाला गया है। विशेषतः इसी अध्याय के आधार पर योगदर्शन पर ’सांख्य’ का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
भारतीय दर्शन की अन्य दर्शन पद्धतियों की भाँति योगदर्शन मंे भी समस्त इच्छाओं का कारण वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान ना होना ही है। शरीर इसी अज्ञान के कारण है। इसका समर्थक चित्त है और इसका विषय सांसारिक सुखोपभोग है। जब तक अविद्या का अस्तित्व है, मनुष्य अपने बोझ को उतारकर फेंक नहीं सकता है। अविद्या विवेक ज्ञान से ही दूर हो सकती है। विवेक ज्ञान के अतिरिक्त योग दर्शन मे मोक्षप्राप्ति के अन्य साधनों पर भी बल दिया गया है। इन साधनों में मानसिक क्रियाओं के दमन पर अधिक प्रकाश डाला गया है। मानसिक अनुशासन से जो अवस्था उत्पन्न होती है उसे ’निद्रा’ की अवस्था नहीं कह सकते है। वह उससे बिल्कुल ही भिन्न रहती है। यद्यपि दोनो का बाहृय रूप एक समान दिखाई पड़ता है। योग के द्वारा एकाग्रता उत्पन्न होती है। रजोगुण और तमोगुण चित्त में क्रमशः बेचैनी तथा मूढ़ता पैदा करते है। सत्वगुण की अधिकता से ही ’एकाग्रता’ उत्पन्न होती है। योगदर्शन की मान्यता है कि सभी मनुष्य ‘आत्मसंयम‘ का पालन करने योग्य नहीं होते है कुछ व्यक्ति ’बहिर्मुख’ होते है, उनके लिए क्रिया योग का विधान है, जिसमें तप स्वाध्याय भक्ति आदि शामिल है। तप के द्वारा क्लेश व कर्म के परिणाम स्वरूप भीतर उपस्थित संस्कार सहित सभी मलिनताएँ नष्ट हो जाती है। एक योगी जब समग्र होकर समाधिस्थित हो जाता है, तब उसके प्रारब्ध, संचित तथा क्रियमाण कर्म सभी नष्ट हो जाते है अर्थात् उनके फल उसे बांधते नहीं है। योगदर्शन में जीवन का लक्ष्य अनासक्ति या परमस्वाधीनता (कैवल्य) प्राप्त करना है जिस ’पूर्णता’ तक पहुँचने की यहाँ बात कही जा रही है उस तक पहुँचने में ’नैतिक-प्रसादन’ करते है। ’यम’ के पाँच भेद- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह केवल व्यक्ति का नैतिक उत्थान ही नहंी करते, अपितु सामाजिक कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करते है। ’नियम’ के अंतर्गत वर्णित पाँच भेद -शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर भक्ति आदि भी मनुष्य की नैतिक उन्नति के परिचायक है। यही नही, योगदर्शन का निम्न सूत्र व्यक्तिगत तथा सामाजिक एवं पारिवारिक संबंधों के बहुत अनुकूल है-
मैत्री करूणामुदितो पेक्षाणां सुखदुख।
पुण्यापुण्य विषयाणां भावनातश्चित प्रसादनम्।।
अर्थात सुख-दुख, पुण्य-अपुण्य विषयों में क्रम से मैत्री, करूणा, प्रसन्नता व उपेक्षा की भावना से चित्त का प्रसादन होता है। योगी समाधि की अवस्था में भले ही सुख-दुख, पाप-पुण्य से परे हो जाए, पर उसके व्यवहार में मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम होता है। उसके लिए सारा संसार उसका अपना होता है। योग मार्ग के लक्ष्य को प्राप्त कर योगी सुख में मैत्री की भावना रखता है अर्थात सुखी जनों को देखकर हर्षित होता है। दुखी जनो को देखकर करूणा द्रवित हो जाता है तथा उनके दुखो को दूर करने की प्रार्थना करता है। पुण्यशीलों को देखकर हर्षित होता है। पापकर्माओं के प्रति भी द्वेष की भावना न होकर उपेक्षा ही उसके मन में रहती है अर्थात अविरोध भाव से इच्छा करता है कि वे पापमुक्त हो जाए। अतः कहा जा सकता है कि योगदर्शन का ’नीतिशास्त्र’ बहुत विकसित है तथा व्यष्टि-समष्टि दोनो के लिए कल्याण साधक है।
उपसंहार -
योग हमें शारीरिक मानसिक शक्तियों का उचित प्रयोग करने एवं उन्हें विकसित करने हेतु प्रेरित करता है। इसके साथ ही ’योग’ एक और स्वाध्याय को महत्व देता है जिसके अंतर्गत धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया जाता है, तो दूसरी और ईश्वर प्रणिधान को। योग तथा उसकी क्रियाए शरीर तथा मन को अनुशासित कर जीवन के चरमोद्देश्य आनंद की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होती है। आत्मा में निहित विशेषताओं की निधियों को खोज निकालना योग से ही संभव है। एकांत, मौन व ध्यान मनुष्य की मानसिकता पर गहरा सकारात्मक प्रभाव छोड़ते है। यही कारण है कि आधुनिक चिकित्सक भी ’योग’ अभ्यास करने का निर्देश देते है। योग भारतीय मनीषियों के आध्याम्कि चिंतन का सार है। योग में ऐसा माना गया है कि मानव व्यक्तित्व दो परम सत्ता के मंच से निर्मित होता है - पुरूष (चेतना) तथा प्रकृति (शक्ति) प्रकृति से अलग पुरूष शुद्ध, अनिश्चित, चेतन तथा सर्वभौम होता है तथा व्यक्तित्व से उसका कोई मतलब नहीं होता पर जब पुरूष के साथ प्रकृति का मिलन होता है तो वह मानव व्यक्तित्व का रूप धारण करता है। इन दोनों के मिलन से विकास की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। आगे चलकर विकास के क्रम में मन तथा शरीर ;उपदक ंदक इवकलद्ध का जन्म होता है। अतः योग के अनुसार व्यक्तित्व सिर्फ शरीर तथा मन नहीं है बल्कि शरीर, मन तथा आत्मा का एक संगठन है। योग में आत्मा को महत्वपूर्ण माना गया है। आत्मा ही शरीर तथा मन की क्रियाओं को निर्धारित करती है जिसके आधार पर व्यवहार होते है। इस प्रकार योग साहित्य के अनुसार व्यक्तित्व में तीन प्रकार के गुण होते है - शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक। व्यक्तित्व के ये तीनों पहलू एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं बल्कि एक-दूसरे पर निर्भर करते है। व्यक्ति यदि इनमें से किसी एक या दो पहलू का ध्यान रखे और तीसरे की उपेक्षा करे तो उसका व्यक्तित्व समुचित रूप से विकसित नहीं होगा और वे पहलू भी बुरी तरह प्रभावित होगे जिनका वह ध्यान रख रहे है। उदाहरणार्थ, पश्चिम के कुछ धनी देशों ने व्यक्तित्व-विकास के शारीरिक तथा मानसिक पहलुओं पर तो पर्याप्त ध्यान दिया पर आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा की। फलतः उनका मानसिक स्वास्थ्य भी आहत हुआ। आज इन समाजों से एक बड़ी संख्या में लोग मानसिक तथा मनोशारीरिक रोगों से पीड़ित होकर भारत जैसे विकासशील देश में मन की शान्ति और स्वास्थ्य प्राप्त करने आ रहे है। अतः योग की यह अवधारणा है कि संतुलित एवं उन्नत व्यक्तित्व-विकास के लिए इसके शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक इन तीनों पक्षों पर समुचित ध्यान देना जरूरी है।
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Received on 11.05.2017 Modified on 19.05.2017
Accepted on 26.06.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(2): 73-76 .